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| बाराचवर का सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र। |
रजनीश मिश्र, बाराचवर (गाजीपुर) - प्रदेश बागडोर संभालते ही मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अफसरान को कड़ी चेतावनी दी थी कि;काम करें या बीआरएस लेकर बैठ जाएं। काम में कोताही बर्दाश्त नहीं की जाएगी । बावजूद इसके उत्तर प्रदेश सरकार के अधिकारी अपनी पुरानी आदतों से बाज नहीं आ रहे। और तो और वह अपनी कमियों को छिपाने के लिए जिम्मेदारी का ठीकरा एक-दूसरे के सिर फोड़ने पर लगे हैं।यहां ह म बात कर रहे है प्रदेश की स्वास्थ्य सेवाओं की। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी से सटा हुआ गाजीपुर का। यही नहीं गाजीपुर पूर्व रेल राज्य मंत्री मनोज सिन्हा का संसदीय क्षेत्र होने के साथ-साथ यह उनका होम डिस्ट्रीक्ट भी है। बावजूद इसके यहां की स्वास्थ्य सेवाएं राम भरोसे हैं। हालत यह है कि विभागीय अधिकारियों की उदासीनता के कारण जिले के प्राथमिक व सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों पर मरीज को इंजेक्शन लगाने के लिए न तो सिरिंज उपलब्ध है और ना ही मरहम-पट्टी करने के लिए कॉटन और बैंडेज उपलब्ध है। यही नहीं कुछ प्रमुख दवाइयां भी उपलब्ध नहीं है।
इस बात की सत्यता जांचने के लिए 'अपना भारत' के प्रतिनिधि विकास खंड बाराचवर के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पहुंचे। वहां की व्यवस्था चौकाने वाली सामने आई। सेहत विभाग के अधिकारियों की लापरवाही का आलम यह है कि ७२ गांवों को संजीवनी देने वाले ब्लॉकस्तरीय सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र बाराचवर में न तो सिरिंज उपलब्ध और ना ही मरहम, कॉटन और बैंडेज। यहां तक कि मरीजों को अस्पताल की ओर से दी जाने वाली दवाओं का स्टॉक भी पूरा नहीं हैं। कुछ यही हाल ब्लॉक के तीन अन्य प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और 25 उपकेंद्रों का भी है। और तो और तहसील स्तरीय सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र मुहम्मदाबाद का भी कम-ओ-बेस यही हाल है।
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व्यवस्थाओं की पोल खोलते मरीज
ओपीडी पर दवा ले रहे मरीजों ने बताया कि दवा तो मिल जाता है, लेकिन इंजेक्शन लगाने के लिए उन्हें सिरिंज, बैंडेज और काटा सहित अन्य प्रमुख दवाएं मेडिकल स्टोर्स से खरीद कर लानी पड़ती है। ओपीडी में मौजूद गांव कामूपुर निवासी 60 वर्षीय नूरमोहम्मद बताते हैं की दवा तो अस्पताल में मिल जाती हैं। लेकिन, इंजेक्शन लगाने के लिए सिरिंज हमें बाहर से खरीदनी पड़ती है। यहां तक कि ब्लड टेस्ट करवाने के लिए नीडल तक खरीदना पड़ता। नूर मोहम्मद कहते हैं कि अस्पताल के कर्मचारी करते हैं कि सिरिंज उपर से (जिले से) ही नहीं आ रहा है। नूर मोहम्मद कहते हैं कि बाहर मेडिकल स्टोर वाले एक सिरिंज के १० से २० रुपये में दे रहे हैं।
पैरासिटामॉल को छोड़ अन्य कोई दवाई नहीं मिलती
अस्पताल में दवा लेने आए गांव दिलशादपुर निवासी 55 वर्षीय कैलाश कहते हैं कि सिरिंज तो छोड़ दीजिए। इस अस्पताल में पैरासिटामॉल को छोड़ कर आवश्यक दवाई भी नहीं मिलती है। और तो और यहां के कुछकर्मचारी मरीजों से ढंग से बात भी नहीं करते। सूई से लेकर दवाई तक बाहर से लानी पड़ती है। यह तो केवल नाम का अस्पताल हो कर रह गया है। दवांए महंगी होने के कारण आदमी खरीद भी नहीं पाता। कैलाश ने कहते हैं कि सरकार की तरफ से हर सुविधा दी जाती है, लेकिन स्वास्थ्य विभाग के लापरवाह अफसरों के कारण ठीक से इलाज नहीं हो पाता। अस्पताल में बने पैथोलॉजी में मौजूद 65 वर्षीय राजकिशोर बताते हैं, कि मैं यहां खून जांच कराना आया हूं इसके लिए भी बाहर से सिरिंज लेकर आना पड़ रहा है । वे कहते हैं कि बाहर से ली दवाए व अन्य मेडिकल सामान विश्वसनिरय भी नहीं होता। इस संबंध में एलटी (लैब टेक्नीसियन) श्याम नारायण यादव कहते हैं कि सिरिंज जिले से ही नहीं आ रहा है। इसलिए मरीजों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।
एक साल से नहीं है सिरिंज और बैंडेज
सामुदायिक स्वास्थ्यकेंद्र बाराचवर के कुछ कर्मचारियों ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि यहां सिरिंज, निडल, मरहम, पट्टी और रूई का स्टॉक पिछले एक साल से नहीं है। साथ ही कुछ प्रमुख दवाएं भी उपलब्ध नहीं है। इसके लिए कई बार उच्चाधिकारियों को लिखा गया, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई। यहां रोजाना 300 से अधिक मरीजों की ओपी डी होती है। कई बार स्थिति यह बन जाती है कि मरीज मारपीट पर उतारू हो जाते हैं। उन्हें किसी तरह समझा-बुझाकर शांत करना पड़ता है। दवाएं न मिलने से यह स्थिति आए दिन बनी रहती है।
कई बार उच्चाधिकारियों को लिखा गया
यहां के मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉक्टर एनके सिंह ने कहा कि यह सही बात है। सिरिंज, बैंडेज वगैरह का स्टाक पिछले एक साल से नहीं है। कई बार में कई बार उच्चाधिकारियों को लिखित और मौखिक तौर पर कहा गया। लेकिन कोई सुनवाई नहीं हो हो रही है। कई बार तो खुद के जेब से पैसे खर्च कर मरीजों के लिए मरहम-पट्टी और सिरिंज मंगवाई जाती है।
लखनऊ से ही नहीं आ रही हैं दवाएं
जिले के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों डवाओं सहित अन्य मेडिकल सामानों की कमी के बारे में जिला अस्पताल में तैनात हेड स्टोरकीपर दुर्गा ने कहा कि एक हफ्ते बाद बाराचवर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पर सिरिंज सहित अन्य मेडिकल सामान भेज दिया जाएगा । उन्होंने कहा कि यह किल्लत लखनऊ से पैदा की गई है। हम लोगों को खरीदारी के लिए बजट आना बंद हो गया है । वहां से कहा जा रहा है, कि आप डिमांड लगाइए, सामान भेज दिया जाएगा। डिमांड से जिले से एक साल से लगाया जा रहा है। लेकिन, लखनऊ से कोई सामान आ ही नहीं रहा है। दुर्गा ने कहा कि इसमें जिले की कोई गलती नहीं है। सारा कुछ स्वास्थ्य विभाग लखनऊ की वजह से से हो रहा है। वहां से दवाइयां आते ही सभी केंद्रों पर वितरित कर दी जाएंगी।
सीएमओ का जवाब, डॉक्टर खुद करें सिरिंज की व्यवस्था
अपना भारत प्रतिनिधि ने जब सीएमओ गाजीपुर डॉ: बीसी मौर्या से फोन पर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में मरहम-पट्टी सहित अन्य वस्तुओं की किल्लत के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा कि यह बात सही है कि सिरिंज की सप्लाई नहीं है। यह व्यवस्था वहां डॉक्टर को करनी होती है। सिरिंज के अलावा बाकी सबकुछ दिया जा रहा है।
दिया जाता रोगी कल्याण समिति का बजट : सीएमओ
उनसे जब यह पूछा गया कि डॉक्टर कहां से व्यवस्था करेंगे। इसपर सीएमओ मौर्या ने कहा कि रोगी कल्याण समिति का बजट हर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र को दिया जाता है। इस बारे में आप बाराचवर केंद्र पर तैनात संबंधित अधिकारी से पूछिए वह बजट कहा जा रहा है। इसी बजट के तहत वहां की व्यवस्थाएं करनी होती हैं।
ऐसा कोई बजट पास ही नहीं हुआ है
सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र बाराचवर के सेहत मुलाजिमों ने नाम न प्रकाशित किए जाने की शर्त पर कहा कि ऐसा कोई बजट अभी तक पास ही नहीं हुआ है। साहब किस बजट की बात कर हैं। पता नहीं। हो सकता है इस साल मार्च में बजट पास हो तो कुछ कहा नहीं जा सकता। फिलहाल तो दवाओं की कमी की वहज से यहां रोज सिरफुटव्वल की स्थिति बनी रहती है। सीएमओ के दावे को यहां के अधिकारियों के खारिज किए जाने के बाद समझ नहीं आ रहा कि किसकी बात सही है। बहरहाल सेहत अधिकारियों के टोपी घुमाने के चक्कर में जनता की सेहत खराब हो रही है।
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| बाराचवर सामुदियक स्वास्थ्य केंद्र में दवा लेते मरीज। |
नसबंदी कैंप के दौरान सेहतकर्मी खुद खरीदते हैं सिरिंज
गाजीपुर जिले में सरकारी स्वास्थ्य सुविधाओं का इससे बुरा हाल क्या होगा कि नसबंदी/नलबंदी कैंपों के दौरान सामुदायिक व प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों के कर्मचारियों को खुद अपनी जेब से 500-1000रुपये तक के सिरिंज और निडल खरीदने पड़ते है। इससे एक तरफ जहां मेडिकल स्टोर संचालकों की मोटी कमाई हो रही है, वहीं सरकारी व्यवस्था को पलीता लग रहा है।
न एक्स-रे की सुविधा है और ना ही नेत्र चिकित्सक
कहने को तो ब्लॉक मुख्यालय बाराचवर में सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र। दो तहसीलों के तीन थाना क्षेत्रों के 72 गांवों के हजारों लोगों के स्वास्थ्य की जिम्मेदारी संभालने वाले इस अस्पताल में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र की तो बात छोडि़ए उपकेंद्र जैसी भी सुविधा नहीं है। यहां न तो एक्स-रे की व्यवस्था है और ना ही ईसीजी की। और तो और यहां न तो गायइनीलॉजिस्ट हैं और ना ही हड्डियों के डॉक्टर। एक नेत्र चिकित्सक भी सप्ताह में तीन दिन बैठते थे तो उनका साल पहल तबादला कर दिया गया।। ऐसे में 'झोलाछाप डॉक्टरों' की पौ बारह है।
आंखे बंद किए प्रतिनिधि
वैसे तो सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों की जिम्मेदारी डीसी व सिविल सर्जन की तो होती है, साथ ही बीडीओ (ब्लॉक डेवलपमेंट ऑफिसर) की भी होती है। लेकिन इन्होंने भी कभी इस तरफ कोई ध्यान नहीं दिया। इसके अलवा लोगों द्वारा चुन कर विधान सभा और लोक सभा में भेजे गए जन प्रतिनिधियों ने भी कभी अस्पताल का दौरान करना उचित नहीं समझा। प्रदेश सरकार को कोसने वाले पूर्व मंत्री और सुभासपा के जहुराबाद से विधायक ओम प्रकाश राजभर ने भी अपने तीन साल के कार्यकाल में एक बार भी यहां नहीं आए। लोगों का आरोप है कि जब ऐसे विधायक और सांसद रहेंगे तो जनता तो क्या सरकारी सुविधाओं की भी 'सेहत' खराब तो होनी ही है।



