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| शो के दौरान स्टंट करतेेमद्दी की फाइल फोटो। |
सुनील दत्त, जालंधर : इसे वक्त का तकाजा ही कहा जाएगा कि जिस कलाकार के मंच पर आते ही लोग तालियां और सीटी बजा कर उसका स्वागत करते थे, आज वही कलाकार अपनी तकदीर के सुराख पर पंक्चर लगा रहा है। यही नहीं कला के प्रति उसकी दिवानगी को देख उस समय लोगों ने उसे पागल दिवाना तक कहना शुरू कर दिया था। लेकिन, अब यही कलाकार गुमनामी की जिंदगी जी रहा है। यह कहानी है मद्रास के तोतीकोरम जिले के 47 वर्षीय मद्दी की। उस मद्दी की जिसे कभी राजनीति की गलियारों से सिनेमा के सितारों तक ने सराहा था। लेकिन आज वही मद्दी जालंधर की काजी मंडी मे छोटे से खोमें में साइकिल के पहियों में पंक्चर लगा रहा है।
ऐसे शुरू हुआ था खतरों से खेलने का सफर
अब 47 साल के हो चुके मद्दी मद्रासी कहते हैं एक बार उन्होंने तोतीकोरम में एक सर्कस देखा था। उस समय उनकी उम्र कोई 17 वर्ष रही होगी। सर्कस मेंएक कलाकार अपने शरीर पर सैकड़ों ट्यूबालाइट्स तोड़ देता, सिर से कांच कीबोतलें और सीने से पत्थर तोड़ देता था। यह देख कर लो तालियां बजाते थे। मद्दी कहते हैं, बस यहीं से उन्होंने ने भी ठान लिया था कि वह भी कुछ ऐसा ही करेंगे कि जब वो स्टेज पर आएं तो लोग तालियों से उनका स्वागत करें। पहले माता-पिता से छिप-छिप कर भी सर्वाजनिक रूप से आए दिन खतरों से खेलना शुरू हो गया।
कर चुके हैं एक हजार से अधिक शो
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| स्टंट मैन मद्दी |
लैला मजनू का गीत कोई पत्थर से न मारे दिवाने को... बजता था तो सिर से शराब की बोतलें और सीने से पत्थर तोड़ा करते थे।
लोगों की तालियां बढ़ाती थीं हौसला
मद्दी मद्रासी कहते हैं गाने के एक-एक शब्द और अंतरे को ध्यान में रख कर एक्टिंग के साथ जब स्टंट करते थे तो पूरा पंडाल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठता था। वो कहते हैं कि उनके पिता सडि़यल मना करते थे। कहते थे तू खतरों से खेलता है तो मेरा कलेजा फटता है। लेकिन मैं कहा मानने वाला था। हमारे पर तो लोगों की तालियों का नशा था। और स्टंट का खेल जारी रहा।
जिंदगी में सबकुछ अच्छा ही नहीं होता
मद्दी कहते हैं, मुझे पैसा और शोहरत सबकुछ मिला। लेकिन, कहते हैं सबकुछ अच्छा नहीं होता। कुछ ऐसा ही हमारे साथ भी हुआ। वे कहते हैं गुरुगन स्वामी और माता मरिअम्मा के मेले में एक बार शो कर था। एमएलए मनोरंजन कालिया मुख्य अतिथि थे। शो देख कर उन्होंने कहा- मद्दी तुझे डर नहीं लगता। यह खतरनाक काम है जान भी जा सकती है।
बिल्कुल मिथुन दा की स्टाइल में सिर पर सफेद पट्टी बांध स्टंटमैन मद्दी कहते हैं, वर्ष 1996-97 में उन्हें हिंदी और पंजाबी फिल्मों से कई ऑफर आए। पर, वे गए नहीं। शोहरत की बुलंदियों पर पहुंच कर काम छोड़ने के बारे में वे कहते हैं, जिंदगी में कुछ ऐसी घटनाएं हुई कि मन खिन्न हो गया। पूरा परिवार ही बिखर गया। मैने यह काम करीब 12 वर्ष पहले ही दिया।
भगवान मुरुगन पर भरोसा। 2018 में छोटे बेटे की हत्या हो गई। इसके बाद मैं टूट सा गया।
अब साइकिल का पंक्चर लगाता हूं
वे कहते हैं- सब दिन एक समान नहीं होते। आदमी जैसा सोचता वैसा नहीं होता। पहले हमारे साथ दस लोगों की टीम होती थी। पैसे की कभी परवाह नहीं की। लेकिन अब अकेला हूं। बिल्कुल अकेला। घर चलाने के लिए साइकिल रिपेयर कीदुकान कर रखा हूं। दिनभर साइकिलों का पंक्चर लगाता हूं। यह पूछे जाने पर
कि क्या आब दोबारा यह काम शुरू कर करते हैं, तो वे कहते हैं-
' मन के सारे अरमान बिखर गए इसलिए अब ये शोहरत, ये पैसा और तालियों की गड़गडाहट सब बेमानी लगता है। पर यह भी सही है कि बंदर कभी गुलाटी मारनानहीं भूलता।
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