

झरोखा न्यूज, खेमकरण (भारत-पाक सीमा से) : 1965 भारत-पाकिस्तान के जंग के हीरो रहे वीर अब्दुल हमीद शहीद शहादत को आज 54 साल हो चुका है। लेकिन खेमकरण, आसल उताड़ और चीमा के लागों के जेहन में अब्दुल हमीद आज भी जिंदा हैं। आखिर क्यों न हों। क्योंकि अब्दुल हमीद ही थे जिनकी बादौल खेमकरण में ही भारतीय सेना के इस वीर योद्धा के सामने पाकिस्तानी
खेमकण में आज वीर अब्दुल हमीद का शहादत दिवस मनाया गया। साथ ही उन बहादुर जवानों का जिन्होंने 1965 की जंग में अपने प्राणों की आहुति दे पाकिस्तान को उसकी औकात बताई थी।
इसी खेमकण में अब्दुल हमीद की मजार पर (जहां वह शहीद हुए थे) भारतीय सेना की ओर से चादर चढ़ाया गया। और शहीदों की शहादत को नमन किया गया। लेकिन इस बार खेमकरण सेक्टर की उन तमाम गांवों के लोगों की आंखें तलाश रहीं थी शहीद अब्दुल हमीद की पत्नी रसूलन बी को। क्योंकि रसूलन बी हर वर्ष अपने पति और मां भारती के सपूत की मजार पर चादर चढ़ाने आती थीं। लेकिन, अपने पति के शहादत दिवस से करीब एक माह पहले उनका निधन हो गया था। शहीद की पत्नी के निधन से आसल उताड, चीमा आदि गांवों के लोग एक माह भी सदमें में थे।
धन्य है मां भारती का वह लाल जिसने पैटन टैंकों को अपनी मामूल लाइट गन से तोड़ न केवल पाकिस्तान को बल्कि अमरिका को भी यह संदेश दिया था कि भारत और भारतीय सेना के लिए कुछ भी असंभव नहीं है। बस जज्बा होना चाहिए।
झरोखा न्यूज की तरफ से 1965 के शहीदों को शतशत नमन। आप को हमारी यह खास पेशकश कैसी लगी।
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