फिरोजपुर  : दोस्‍तों क्‍या आप जानते हैं ब्रिटिश इंडियन रेलवे देश की आजादी में क्रांतिकारियों के लिए कितना कारगर हथियार साबित हुई थी।
सन 1853 में 21 तोपों की सलामी के साथ दोपहर 3:45 बजे पोरबंदर से ठाणे के लिए जब पहली बार 14 डिब्‍बों को लेकर भारतीय ट्रेन रवाना हुई थी तब अंग्रेजों ने शायद यह सोचा भी नहीं था कि उनकी यही ट्रेन उन्‍हीं के खिलाफ भारत की आजादी की लड़ाई हथियार की तरह इस्‍तेमाल की जाएगी। अगर 1846 में अमरीका में कपास की फसल खराब न हुई होती तो कदाचित रेलवे को भारत मे आने में कुछ वक्‍त और लग जाता।  इसकी लोकप्रियता का आंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि बहादुर शाह जफर ने साफ कहा था , ' अगर हम दोबारा भारत के बादशाह बनते हैं तो यह हमारा वादा है कि भारत के व्‍यापारियों को शासन की तरफ से रेलवे लाइने उपलब्‍ध करवाई जाएंगी।'

 गांधी ने सबसे अधिक किया राजनीति में रेलवे का इस्‍तेमाल
 रेलमंड फिरोजपुर के  मंडलीय परिचान प्रबंधन एवं रेलवे हैरिटेज कमेटी के सदस्‍य एसपी सिंह भाटिया कहते हैं - देश को आजादी दिलाने में रेलवे का इस्‍तेमाल सबसे अधिक यदि कोई किया है तो वह हैं महात्‍मा गांधी।  वो कहते हैं कि इसकी शुरुआत दक्षिण अफ्रिका से हुई थी। जब पीटरमैरिट्जबर्ग में जहां एक रात एक गोरे ने फर्स्‍ क्‍लास के रेल के डिब्‍बे से महात्‍मा गांधी का सामान प्‍लेटफार्म पर फेंक दिया था। उस समय महात्‍मा गांधी महात्‍मा नहीं बल्कि मोहनदास कर्मचंद गांधी हुआ करते थे।
 एसपी सिंह कहते हैं कि इस घटना के बाद जब महात्‍मा गांधी भारत लौटे तो उन्‍होंने कभी भी फर्स्‍ट क्‍लास डिब्‍बे में सफर नहीं किया। वे कहते हैं जितना गांधी ने रेलवे का राजनीतिक इस्‍तेमाल किया उतना किसी ने नहीं किया।
फ्रंटियर मेल से पेशावर पहुंचे थे सुभाष चंद्रबोस
एसपी सिंह रेलवे के अभिलेखागार से मिली जानकारियों का हवाला देते हुए कहते हैं कि - 1941 में सुभाष चंद्र बोस अपने घर में नजरबंद थे। उस समय वह मोहम्‍मद जियाउद्दीन का भेष बना कर पहले कार गोमो रेलवे स्‍टेशन गए थे। और फिर वहां से कालका मेल पकड़ कर दिल्‍ली और फिर वहां से फ्रंटियर मेल में बैठक कर पेशावर पहुंच गए थे।
सगत बोस की पुस्‍तक में मिलता है उल्‍लेख
सगत बोष अपनी पुस्‍तक ' हिज मैजिस्‍टीज अपोनेंट' में लिखते हैं, ठीक एक बज कर 35 मिनट पर सुभाष ने मोहम्‍मद जियाउद्दीन का भेष धारण किया। उन्‍होंने उस सुनहरे फ्रेम के चश्‍मे को पहना जिसे वह करीब दस वर्ष पहले पहनना छोड़ दिए थे। अपना पुराना यूरोपियन जूता पहना और घर से विदा ली। वो आगे लिखते हैं- गोमो स्‍टेशन पर एक कुली ने बोस का सामान उठाया और उन्‍हें कालका मेल में बिठा दिया। इसके बाद सुभाष अपने परिवार वालों से कभी नहीं मिले।
 काकोरी में क्रांतिकारियों ने ट्रेन को बनाया निशाना
नौ अगस्‍त 1925 की वो घटना अंग्रेजी हुकूमत को हिला कर रख दी थी। जब रामप्रसाद बिस्‍मिल के नेतृत्‍व में काकोरी के पास 8 डाउन सहारनपुर-लखनऊ पैसेंजर को रोक कर क्रांतिकारियों ने सरकारी खजाना लूट लिया था। इस पैसे से क्रांतिकारियों ने हथियार खरीदे थे।
भगत सिंह भी भागे थे रेल से
फिरोजपुर रेल मंडल के एक अन्‍य अधिकारी बताते हैं भगत सिंह भी सांडर्स की हत्‍या के बाद किस तरह ट्रेन से कलकत्‍ता भागे थे। ईश्‍वर दयाल गौड़ अपनी किताब 'मार्टियर्स एज ब्राइडग्रूम अ फोक रिपजेजेन्‍टेशन ऑफ भगत सिंह' में लिखते हैं- सांडर्स की हत्‍या के बाद भगत सिंह और चंद्रशेखर आजाद ने 17 दिसंबर 1928 की रात लाहौर के डीएवी कॉलेज के आहते में बिताई। दूसरे दिन सुबह भगत सिंह, भगवती चरण वोहरा की पत्‍नी दुर्गा देवी के यहां चले जाते हैं। इसके बाद वे वेष बदल कर लाहौर रेलवे स्‍टेशन पहुंचते हैं, जहां से उन्‍होंने कलकत्‍ता के लिए दो फर्स्‍ट और दो थर्ड क्‍लास की टिकट खरीदे। जबकि उनके साथी राजगुरु और चंद्रशेखर आजाद तीसरे दर्जे के डिब्‍बे में सफर करते हुए लखनऊ रेलवे स्‍टेशन पहुंचे और फिर वेष बदल कर कलकत्‍ता पहुंच गए। यही नहीं पलवल में गांधी जी की पहली गिरफ्तारी भी ट्रेन से ही हुई। नील आंदोलन के दौरान पश्चिमी चंपारन तक का सफर भी गांधी जी ने ट्रेन से ही किया।