द झरोखा न्यूज : भारतीय स्वतंत्रा संग्राम के सौ साल के इतिहास के धुंधलकों में झांके तो इतिहास का एक ऐसा अध्याय दिखाई देता है जिसके पन्नों पर लिखी इबारत भरतीयों के बुलंद हौसलों की अनसुनी दस्तान सुनाती है।94 साल पहले की यह घटना आज भी हिंदुस्तानियों के धमनियों जोश भरदेती है। हम बात कर रहे हैं 9 अगस्त 1925 की उस घटना की जिसे भारतीय स्वतंत्रा संग्राम के इतिहास में काकोरी कांड के नाम से जाना जाता है।
क्यों आन पड़ी थी ट्रेन डकैती की जरूरी
ऐतिहासिक प्रमाणों के मुताबिक हिंदुस्तान प्रजातंत्र संघ की ओर से प्रकाशित इश्तहार और उसके संविधान को लेकर बंगाल पहुंचे दल के दो प्रमुख नेताओं शचींद्रनाथ सान्याल को बांकुरा में उस समय गिरफ्तार कर लिया गया जब वह ये इश्तहार अपने किसी साथी को पोस्ट करने जा रहे थे। वहीं योगेश चंद्र चटर्जी को हावड़ा रेलवे स्टेशन पर ट्रेन से उतरते ही पकड़ लिया गया । और उन्हें हजारीबाग जेल मे डाल दिया गया।
इन दो बड़े नेताओं की गिरफ्तारी के बाद दल के बंगाल और उत्तर प्रदेश के कार्यों का सारा दायित्व अब पं: रामप्रसाद बिस्मिल के कंधों पर आ पड़ी। पार्टी के काम को आगे बढ़ाने के लिए पैसों की आवश्यकता थी। इसके लिए दल के सदस्यों ने 7 मार्च 1925 को बिचपुरी और 24 मई 1925 को द्वारकापुर में दो राजनीतिक डकैतियां डलीं। लेकिन कोई खास धन नहीं मिला। इसके बाद यह फैसला लिया गया कि क्रांतिकारी गतिविधियों के लिए केवल सरकारी खजाने को ही लूटा जाएगा।
8 अगस्त को शाहजहांपुर में बनी योजना
8 अगस्त 1925 को शाहजहांपुर में रामप्रसाद बिस्मिल के घर पर आपात बैठक हुई। इसमें सहारनपुर-लखनऊ पैसेंजर ट्रेन में लूट की योजना बनी। अगले ही दिन 9 अगस्त 1925 को शाहजहांपुर रेलवे स्टेशन से बिस्मिल सहित कुल दस लोगों जिनमें अशफाक उल्ला खां, मुरारी शर्मा और बनवारी लाल, बंगाल से राजेंद्र नाथ लाहिड़ी, शचींद्रनाथ बख्शी और केशव चक्रवर्ती, बनारस से चंद्रशेखर आजाद, मन्मथनाथ गुप्त और औरैया से मुकुन्दी लाल शामिल थे। ये सभी 8 डाउन शाहजहांपुर-लखनऊ पैसेंजर ट्रेन में सवार हो गए। यह ट्रेन लखनऊ के पास काकोरी से अभी कुछ ही दूर आगे बढ़ी थी कि क्रांतिकारियों उसे चेन खिंच कर रोक लिया और गार्ड के डिब्बे से सरकारी खजाने का बक्सा नीचे गिरा दिया। पहले तो उसे खेलने की कोशिश की गई, परंतु जब वह नहीं खुला तो उसे हथौड़े से तोड़ कर सरकारी खजाना लूट लिया।
लूट कांड की इस घटना से तिलमिलाई ब्रिटिश सरकार ने हिंदुस्तान रिपब्लिकन ऐसोसिएशन के 40 सदस्यों को मुकदमा चलाया, जिसमें राजेंद्र नाथ लाहड़ी, रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खां और ठाकुर रोशन सिंह को फांसी की सजा सुनाई। जबकि 16 क्रांतिकारियों को कालापानी की सजा सुनाई।
(शेष कहानी कल 10 अगस्त की पोस्ट में पढ़ें।)
